दीवाली के पटाखे, पर्यावरण की बड़ी परेशानी |

पर्यावरण के लिए पटाखे बड़ी परेशानी -


पर्यावरण को बचाना आज हमारी सबसे बड़ी जरुरत है | विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का लगातार दोहन हो रहा है | ऐसे में समन्वय बना रहे इस पर हमे ध्यान देना होगा | हमारी परम्परा और संस्कृति में पर्यावरण के संरक्षण की बात कही गई है | पर्यावरण के बगैर मानवीय जीवन का अस्तित्व संभव नहीं है |

दीवाली के पटाखे, पर्यावरण की बड़ी परेशानी |

  दीपावली साफ़ सफाई का पर्व है | दीपावली बुराई पर अच्छाई का पर्व है | दीपावली शीत ऋतु के आगमन का पर्व है | लेकिन दीपावली के त्यौहार के महीने भर पहले ही बाजारों में पटाखों की दुकानें सजने लग जाती हैं | प्रतिवर्ष दीपावली पर करोड़ों रुपयों के पटाखों का व्यापर होता है | यह सिलसिला कई दिनों तक चलता है | कुछ लोग इसे फिजूलखर्ची मानते हैं, तो कुछ इसे परम्परा से जोड़कर देखते हैं | पटाखों से बसाहटों, व्यावसायिक, औद्योगिक और ग्रामीण इलाकों की हवा में तांबा, कैल्शियम, गंधक, एल्युमीनियम और बेरियम प्रदूषण फैलाते हैं | उल्लिखित धातुओं के अंश कोहरे के साथ मिलकर अनेक दिनों तक हवा में बने रहते हैं |


गौरतलब है कि विभिन्न कारणों से देश के अनेक इलाकों में वायु प्रदूषण सुरक्षित सीमा से अधिक है | ऐसे पटाखों से होने वाला प्रदूषण भले ही अस्थायी प्रकृति का होता है लेकिन उसे और अधिक हानिकारक बना देता है | औद्योगिक इलाकों की हवा में विभिन्न मात्रा में राख, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अनेक हानिकारक तथा विषैली गैसें और विषाक्त कण होते हैं | इन इलाकों में पटाखे फोड़ने से प्रदूषण की गंभीरता तथा  होने वाले नुकसान का स्तर कुछ दिनों के लिए बहुत अधिक बढ़ जाता है | महानगरों में वाहनों के ईंधन से निकले धुंए के कारण समान्यतः प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक होता है | पटाखे उसे कुछ दिनों के लिए बढ़ा देते हैं | उसके कारण अनेक जानलेवा बिमारियों मसलन - ह्रदय रोग, फेफड़े, गॉल ब्लैडर, गुर्दे, यकृत( लीवर ) एवं कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है |

दीवाली के पटाखे, पर्यावरण की बड़ी परेशानी |

 इसके अतिरिक्त पटाखे पृथ्वी के जीवन कवच 'ओजोन परत' को भी भरी नुकसान पहुंचाते हैं पटखों से निकले धुंए के कारण वातावरण में दृश्यता घटती है |  दृश्यता घटने से वाहन चालकों को कठिनाई होती हैं और कई बार यह दुर्घटना का कारण बनती है | इसके अलावा पटाखे बनाने वाली कंपनियों के कारखानों में होने वाली दुर्घटनाएं और मौतें कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनसे सबक लेना चाहिए | इन मुद्दों में स्वास्थ्य मानकों की अनदेखी, बाल मजदूरी नियमों की अवहेलना या असावधानी मुख्य हैं | इन सब दुष्परिणामों के बाद सवाल है कि क्या पटाखे फोड़ना हमारे लिए जरुरी हैं ? क्या पटाखे फोड़ने से ही दीपावली मनाना संभव है ?


पहले हमारे देश में मिट्टी के दिये जलते थे | बाद में इसका स्थान केरोसिन के दिये ने ले लिया | उसके बाद झालर और लाइट लगाने की परम्परा आ गई, जिसका स्थान चाइनीज समानों ने ले लिया | पुनः पटाखों ने दीपावली में घुसपैठ जमाई | ऐसे में पटाखे फोड़ने की जगह खुला क्षेत्र होना चाहिए क्योंकि पटाखों की वजह से कई पशु और जानवर मारे जाते हैं | कई बार नियम बनाने पड़ते हैं जिससे शहर में लोगों को दिक्कत नहीं हो | जैसे दिल्ली क्योंकि ये पहले से ही काफी प्रदूषित है और दीपावली की रात तो इसे बर्बाद कर देता है | कई लोग पटाखे फोड़ने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं, वे लोग मनोरंजन के आगे मानवता को तुच्छ समझते हैं | व्यापारी लोग पटाखे बेचने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं क्योंकि उन्हें अपना पटाखा बेचना है | दूसरी तरफ चीन अपने पटाखे भारतीय बाजार में बेच रहा है जो ज्यादा प्रदूषण फैलाता है | कई लोग पटाखे फोड़ने से रोकने के तर्क को अपने धर्म की हानि समझते हैं | ये हमारे धर्म के सबसे बड़े दुश्मन हैं | जब तक हमारी परम्परा और संस्कृति सुरक्षित है हमारा धर्म भी सुरक्षित रहेगा | दिखावा धर्म की सुरक्षा का प्रतीक कभी नहीं हो सकता |

दीवाली के पटाखे, पर्यावरण की बड़ी परेशानी |

हमारे धर्म ग्रंथों में दीपक जलाने की बात कही गयी है | आतिशबाजी का कई नामोनिशान तक नहीं है | पूर्वजों ने भी इसी का पालन किया दीपक जलाकर, रंगबिरंगी रोशनी के माध्यम से इस पर्व को खुशी की सौगात दी है |  ज्यादा ही मनीषा हुई तो फुलझड़ी जला के मन को प्रसन्न कर लिया | आतिशबाजी और पटाखेबाजी केवल आधुनिक विकृतियां हैं | बेकार की फिजूलखर्ची है | क्षण भर में लाखों रुपयों का नुकसान के साथ-साथ अमूल्य पर्यावरण को भी हानि है |


अतः हमें मानवीय नजरियां रखते हुए 'शुभ दीपावली' ,अशुभ पटाखा' की परम्परा की शुरुआत करनी चाहिए | दीपावली का त्यौहार चार दिनों में ही सम-सामयिक समाज की नैतिकता के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालता है ये क्या सोचा है आपने ? आंखो में फुलझड़ियों की चमक, जिह्वा पर खील-बताशे, चीनी के खिलौनों की मधुरता और हाथों में दिया आरती की थाली लिए छत, गलियारों और सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे भागते बच्चे सरलता और संतुष्टि का आयाम है | सीमित साधनों में सारे परिवार के लिए उपहार लाते गृहस्वामी और त्यौहार के लिए घर की लक्ष्मी की दिन-रात की उपक्रम दिनचर्या में त्याग और निस्वार्थ स्नेह के आयाम है | क्या है इस सामाजिक रोग का उपचार ? अतः जब तक समाज में और जीवन में तामसिकता है, कुविचार है, तब तक दीपावली अधूरी है | दीप जलाना मात्र औपचारिकता नहीं है | दीप अंतर के तमस को अंत करने की प्रेरणा देता है | आओ, हम सब मिलकर देश को आंतक और कुत्सित प्रवृत्तियों से मुक्त करने की प्रेरणा लें |

"हम सभी अब दीपावली के नाम पर पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं | अब हमें पुनः अपनी परम्परा को समझना होगा | हमें मिट्टी के दिये जलाने की परम्परा की पुनः शुरुआत करनी होगी | इससे कीड़े मकोड़े मरते हैं | झालर और लाइट से कीड़े नहीं मरते | हमारी संस्कृति सरसों के तेल के दिये जलाना है, अच्छे पकवान बनाना, मिठाइयां खाना और पडोसी को भी खिलाना, लोगों को उपहार देना आदि है | लेकिन लोग अब उतने समझदार नहीं हैं इसलिए पटाखे छूटेंगे |"

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