व्यर्थ बहता है पानी !

व्यर्थ बहता है पानी !


हा गया है कि जल ही जीवन है | जल प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है | कहने को तो पृथ्वी चारों ओर से पानी से ही घिरी है लेकिन मात्र 2.5% पामी ही प्राकृतिक स्रोतों-नदी, तालाब, कुओं और बावड़ियों से मिलता है, जबकि आधा प्रतिशत भू-जल भंडारण है | सर्वाधिक चिंतित करने वाली बात यह है कि भारत जल संकट वाले देशों की कतार में आगे खड़ा है |

व्यर्थ बहता है पानी !

 अभी बारिश का दौर जारी है लेकिन बारिश के पानी को सहेजने के लिए उचित प्रबंध व्यवस्था की कमी भी सामने आ रही है | बारिश के पानी को वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के द्वारा भूमि में उतारने या होज में इकट्ठा करने के लिए, प्रत्येक घर की छत को पाइप से जोड़ने की प्रक्रिया बिलकुल निम्न स्तर पर होने के कारण करोड़ों लीटर बरसाती पानी व्यर्थ बह जाता है | 


फिर जब गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत होती है, तो पानी की कमी का रोना रोया जाता है जबकि जरुरत है बरसाती सीजन में जल के उचित संग्रहण की |

व्यर्थ बहता है पानी !

 अगर ऐसा व्यापक स्तर पर हो तो कभी कमी नहीं होगी | न केवल भारत बल्कि दुनिया के विभिन हिस्सों में रह रहे करोड़ों लोग जबरदस्त जल संकट का सामना कर रहे हैं और दूषित जल का उपयोग करने को अभिशप्त हैं | ऐसे में बेहतर जल प्रबंधन से ही जल संकट से बचाव और सरक्षण किया जा सकता है | भारत में भी वही तमाम समस्याएं है जिनमे पानी की बचत कम, बर्बादी ज्यादा है | 


यह भी सचाई है कि बढ़ती आबादी का दबाव, प्राकृतिक से छेड़छाड़ और कुप्रबंधन भी जल संकट का एक महत्वपूर्ण कारण है | पिछले कुछ सालों से अनियमित मानसून और वर्षा ने भी जल संकट और बढ़ा दिया है | इस संकट ने जल सरक्षण के लिए कई राज्यों की सरकारों को परम्परागत तरीको को अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है | 

व्यर्थ बहता है पानी !

भारत में 30% से अधिक आबादी शहरों में रहती है | आवास और शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते है कि देश के लगभग दो सौ शहरों में जल और बेकार पड़े पानी के उचित प्रबंधन की ओर तत्काल ध्यान देने की जरुरत है | जल संसाधन मंत्रालय का मन्ना है कि वर्तमान में जल प्रबंधन की चूनौतियां लगातार बढ़ती जा रही है | सिमित जल संसाधन को कृषि, नगर निकायों और पर्यावरणीय उपयोग के लिए मांग, गुणवत्ता पूर्ण जल आपूर्ति के बीच समन्वय की जरूरत है | 


जल प्रबंधन को बेहतर बनाने में राष्ट्रीय जल नीतियों की अतयन्त ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है | यदापि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकि है | जल-नीतियों के माध्यम से अब तक हुई प्रगति काफी नहीं है | दिनों-दिन गंभीर होते जल संकट को देखते हुए पिछले 70 सालों में तीन राष्ट्रीय जल नीतिया बनाई गई | पहली नीति 1987 में बनी, जबकि 2002 में दूसरी और 2012 में तीसरी जल नीति बनी | इसके अलावा 14 राज्यों ने अपनी-अपनी जल-नीतियां बना ली है | 

व्यर्थ बहता है पानी !

बाकि राज्य तैयार करने की प्रक्रिया में है | राष्ट्रीय जल नीति में जल को एक प्राकृतिक संसाधन मानते हुए इसे जीवन, जीविका, खाद्य सुरक्षा और निरंतर विकास का आधार माना गया है नीति में जल के उपयोग आवटन में समानता तथा सामाजिक न्याय के नियमों को अपनाए जाने की बात कही गई है | जल नीति में इस बात पर बल दिया गया है कि खाद्य सुरक्षा, जैविक तथा सामान और स्थायी विकास के लिए राज्य सरकारों को सार्वजनिक धरोहर के सिद्धांत के अनुसार सामुदायिक संसाधन के रूप में जल का प्रबंधन करना चाहिए |

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